ब्रह्मा जी ने कहा हे नारद शिवजी की असंख्या सेना को देखकर अर्जुन अपने मन मे तनिक भी भयभीत नहीं हुए हुए अपने धनुष बाण लेकर सामने युद्ध करने के लिए जा खड़े हुए उसे समय की रात रूप धारी शिव जी ने सर्वप्रथम सांसारिक कृति के अनुसार अर्जुन के पास अपना दूध भेजो और वह डलवाया की ही तपस्वी तुम हमारी सेवा को अपनी आंखों से देखकर प्रणाम का विचार कर लो और हमारा बढ़ हमें लौटा दो जब तू यह विचार अर्जुन को दिया तो अर्जुन ने निर्भय होकर यह उत्तर दिया हेतु तू हमारे स्वामी से जाकर यह कह दे कि यदि हम भयभीत होकर तुम्हें बढ़ लौटा दे तो हमारे कुल मैं दाग लग जाएगा तू अपने स्वामी से जाकर कह दो कि हम युद्ध करने के लिए प्रस्तुत है वह भी मैदान में आकर हमारी शक्ति को देख ले हे नारद अर्जुन की बात सुनकर दूध ने शिव जी के पास पहुंचकर सब समाचार का सुनाया तब भूल पति शिवाजी अपने सी सहित अर्जुन के साथ युद्ध करने को तैयार हुई जिस समय उन्होंने युद्ध आरंभ करने के लिए अपना शंख बजाया उसे समय अर्जुन भी शिवजी का ध्यान धर कर युद्ध करने के लिए सामने आ पहुंचा तब शिवजी के गानों ने अपने स्वामी की आज्ञा अनुसार ऐसे बढ़ वर्ष की अर्जुन पहले तो कुछ व्याकुल हुए परंतु फिर शिव जी का ध्यान धर कर उन सब पहाड़ों को काट डाला था दो प्राण उन्होंने अपने बार वर्ष द्वारा कि की रात रूपी शिवजी की संपूर्ण सेवा के पांव उखड़ दिए केवल शिवजी ही हुआ जहां के तहत खड़े रहे तब उन दोनों में घोर युद्ध होने लगा उसे युद्ध को देखकर संपूर्ण सृष्टि में आकर मच गया पृथ्वी कटने लगी तथा सभी देवता दुखी हो गए उसे युद्ध में गिरी की रात रूप धारी शिवजी अर्जुन को पकड़ कर आकाश की ओर ले गए वहां उन्होंने अर्जुन को दोनों पांव पकड़ कर चारों ओर घुमाया परंतु भी अर्जुन ने किसी प्रकार अपनी हार नहीं मानी अत माय शिवजी ने भक्ति के वशीभूत हो अर्जुन के ऊपर कृपा करके अपने मुख्य रूप को प्रकट कर दिया हे नारद जी समय अर्जुन ने यह देखा कि पूरे जी स्वरूप का ध्यान किया करते थे वही स्वरूप नेत्रों के सम्मुख खड़ा है तो अपने मन में लज्जित होकर पश्चाताप करने लगी तत्पश्चात उन्होंने शिवजी को प्रणाम करके यह स्तुति की है प्रभु मुझे आज्ञा अवस्था में जो अपराध बन पड़ा है उसे आप क्षमा करने की कृपा करें इतना कह कर जब अर्जुन शिवजी के चरणों में पर गिर पड़े उसे समय शिव जी ने उन्हें कृपा पूर्वक उठाकर अपने हृदय से लगा लिया और इसी प्रकार कहा है अर्जुन तुम किसी प्रकार की चिंता मत करो तुम हमारे परम भक्त हो हमने यह चरित्र तुम्हारी परीक्षा लेने के निर्मित किया था अब तुम्हारी जो इच्छा हो वह और हमसे मांग लो यह सुनकर अर्जुन ने शिवजी की अत्यंत प्रार्थना करते हुए कहा हे प्रभु आप अंतर्यामी तथा संपूर्ण मनोकामना हो को पूरा करने वाले हैं अब यदि आप पूछे ही रहे हैं तो आपसे यह मांगता हूं कि आप मुझे दोनों लोग की रिद्धि सिद्धि प्रदान करने की कृपा करें इतना कहकर अर्जुन हाथ जोड़कर खड़े हो गए हे नारद अर्जुन की यह प्रार्थना सुनकर शिवजी ने उन्हें अपना पाशुपत अस्त्र देते हुए कहा है अर्जुन अब तुम्हारे सभी दुख दूर हो जाएंगे हमने तुम्हें अपना भक्त जानकारियां अस्त्र प्रदान किया है कि इसके कारण तुम किसी से भी नहीं हारोगे और सभी शत्रुओं का विजय प्राप्त करोगे अपने भाइयों सहित पुणे राज को प्राप्त करोगे और तुम्हारी सभी कासन को हम नष्ट करते रहेंगे इतना कहकर शिवजी ने अर्जुन के शरीर पर अपना हाथ फिर आया था तो प्रार्थना ने आशीर्वाद देकर अंतर ध्यान हो गए उसे समय अर्जुन भी अत्यंत प्रसन्न हो पाशुपत अस्त्र को लेकर वहां से अपने स्थान को लौट आए तथा अपने भाइयों को संपूर्ण वृतांत का सुनाया जब 12 वर्ष की अवधि समाप्त हो गई तब पांडव ऑन ने नगर में पहुंचकर शत्रुओं पर विजय प्राप्त की शिवजी की कृपा से उन्होंने संपूर्ण कौरवों का संघार किया तथा युधिष्ठिर ने राज सिंहासन को प्राप्त किया है नारद रितेश्वर शिव अवतार की इस चरित्र को जो मनुष्य पड़ता अथवा सुनता है वह भी अपने संपूर्ण मनोरथ को प्राप्त कर शिवलोक में स्थान पाता है
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Brahma Ji said, O Narada, seeing the innumerable army of Lord Shiva, Arjuna was not afraid even a bit in his mind, took his bow and arrow and stood in front to fight. At that time, Lord Shiva in the form of night sent his milk to Arjuna as per the worldly act and told him that ascetic, you should see our service with your own eyes and consider paying your respects and return our bull to us. When he gave this idea to Arjuna, Arjuna fearlessly replied that you should go and tell our master that if we return the bull to you out of fear, then our clan will be tainted. You should go and tell your master that we are ready to fight, he should also come to the battlefield and see our strength. O Narada, after listening to Arjuna, milk reached Lord Shiva and told him all the news. Then forgetting Arjuna's words, Lord Shiva along with his wife got ready to fight with Arjuna. When he blew his conch to start the war, at that time Arjuna also came in front to fight, meditating on Lord Shiva. Then Lord Shiva's cows, as per the order of his master, made Arjuna eat the bull like this. So he became a bit worried, but then meditating on Lord Shiva, he cut down all those mountains. He uprooted the feet of Lord Shiva in the form of night with his twelve souls. Only Lord Shiva stood there. Then a fierce battle started between the two. Seeing the battle, the whole universe got agitated. The earth started getting cut and all the gods became sad. In that battle, Lord Shiva in the form of night caught Arjun and took him to the sky. There, he held Arjun's both feet and turned him around. But Arjun did not accept defeat in any way. Then Lord Shiva, being overcome by devotion, showed mercy on Arjun and revealed his main form. O Narad ji, when Arjun saw that the same form of the Lord, on whom he used to meditate, was standing in front of his eyes, he felt ashamed and repented. After that, he bowed to Lord Shiva and prayed that Lord, please forgive me for the crime that I have committed in my state of obedience. Saying this, when Arjun fell at the feet of Lord Shiva, Lord Shiva graciously lifted him up and kept him in his heart. He hugged him and said to Arjun, do not worry about anything, you are our supreme devotee, we had created this character to test you, now whatever you wish for, ask us. Hearing this, Arjun prayed to Lord Shiv and said, O Lord, you are omniscient and the fulfiller of all desires. Now if you are asking, then I ask you that you please grant me the Riddhi Siddhi of both of me. Saying this, Arjun stood with folded hands. O Narada. Hearing this prayer of Arjun, Lord Shiv gave him his Pashupat weapon and said, Arjun, now all your sorrows will be removed. We have given you our devotee Jankari weapon, due to which you will not lose to anyone and will conquer all your enemies. You will get the kingdom of Pune along with your brothers and we will keep destroying all your castles. Saying this, Lord Shiv brought his hand on Arjun's body, then the devotee blessed him and went into deep meditation. At that time Arjun also became very happy and returned to his place from there with Pashupat weapon and narrated the entire story to his brothers. When the year ended, the Pandavas reached the city and conquered their enemies. By the grace of Lord Shiva, they killed all the Kauravas and Yudhishthira ascended the throne. The person who reads or listens to this story of Narad Riteshwar Shiva incarnation also gets all his wishes fulfilled and gets a place in Shiva Lok.
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