श्री शिव महापुराण कथा सातवां खंड अध्याय 55



ब्रह्मा जी ने कहा हे नारद व्यास जी के चले जाने के उपरांत सभी भाइयों ने अर्जुन को अत्यंत तेजस्वी रूप में देखा टाङू प्रांत उन्होंने आशीर्वाद देते हुए अर्जुन को तपस्या करने के हेतु विदा किया वह सबको प्रणाम आदि करके शुभ मुहूर्त में शिव जी का तप करने के लिए चल दिए और गंगा जी के तट पर इंद्र की नामक स्थान के निकट पहुंचकर शोक वन में स्थित हुए वहां सर्वप्रथम वेदी बनाकर उन्होंने गुरु की आराधना की तदुपरांत आसन पर बैठकर पांच सूट पार्टी का विधि पूर्वक निर्माण किया फिर हुए पथिक पूजन के मंत्र का जाप करने लगे हे नारद तपस्या के प्रभाव से या 12 जून के मस्तक से प्रकाश निकलने लगा उसे समय उसे वन में रहने वाले इंद्र के सेवकों ने इंद्र के पास जाकर यह प्रार्थना किया कि हे प्रभु अशोक वन में न जाने ऐसा कौन सा तपस्वी तप कर रहा है जिनके मस्तक से उत्पन्न हुए अग्नि के कारण हम सब जलने से कुछ ही बज गए हैं सेवकों की बात सुनकर जब इंद्र ने ध्यान धरकर विचार किया तो उन्हें ज्ञात हुआ कि यह कार्य हमारे पुत्र अर्जुन का है उसे पुत्र अर्जुन को दुखी देखकर इंद्र को भी बहुत शौक हुआ था दो प्रांत हुए प्रीत ब्राह्मण का स्वरूप धारण कर हाथ में लाठी लिए हुए अर्जुन के समीप जाकर खड़े हो गए जब अर्जुन ने उसे ब्राह्मण रूपी इंद्र को अपने सामने खड़ा हुआ देखा तो उनका हर प्रकार से स्वागत सम्मान किया उसे इन उसे समय इंद्र ने अर्जुन से पूछा है छतरी पुत्र तुम ऐसा कठोर तब किस लिए कर रहे हो हे नारद ब्राह्मण रूपेंद्र के वचन सुनकर अर्जुन ने उन्हें सब हाल सुनाया तब इंद्र ने यह उत्तर दिया है अर्जुन तुम्हारा तब करना व्यर्थ है सांसारिक सुख तो थोड़े दिन तक रहते हैं वास्तु मनुष्य को इन सुखों के मुंह में ना पढ़ कर मुक्ति का विचार करना चाहिए मुक्ति देना इंद्र के वास की बात नहीं है जो देवता मुक्ति प्रदान कर सकें तुम्हें तो उसी की आराधना करनी उचित है यह सुनकर अर्जुन ने उत्तर दिया है ब्राह्मण आपको इन बातों से क्या प्रयोजन हम व्यास जी के आजा अनुसार अपना कार्य कर रहे हैं आज तो आप हमें उसकी विपरीत उपदेश करने की कृपा ना करें इंद्र ने जब अर्जुन की ऐसी दृढ़ता देखी तो उन्हें अर्जुन के ऊपर बहुत प्रेम हुआ उसे समय उन्होंने अपने वास्तविक रूप में दर्शन दिए तथा यह कहा है पुत्र हमने ब्राह्मण बनकर तुम्हारी परीक्षा ली थी शिवजी मुक्ति मुक्ति को प्रदान करने वाले हैं उन्होंने ही कृपा से हमने ब्राह्मण ने तथा विष्णु जी ने उच्च पद को प्राप्त किया है अस्तु तुम आज से हमारे मंत्र को त्याग कर शिवजी के मंत्र का जाप करो तथा आर्थिक पूजन करके उन्हें का ध्यान धरो तुम्हारा पूजन में किसी प्रकार का विधान उपस्थित नहीं होगा तथा शिव जी प्रसन्न होकर तुम्हें वर्क प्रदान करेंगे हे नारद इतना कह कर तथा आशीर्वाद देकर इंद्र अपने लोग को चले गए तब अर्जुन ने स्नान एवं आगे विन्यास करके शिवजी का ध्यान किया तत्पश्चात हुए पार्थिविक पूजन करके एक पांव से सूर्य के सम्मुख खड़े हो गए और शिव मंत्र का जाप करने लगे उनके किताब को देखकर ऋषि मुनि भी आचार्य चकित हो उठे तब अर्जुन को कुछ समय सी प्रकार तक पक्ष करते हुए व्यतीत हो गया तब ऋषि मुनि ने कैलाश पर्वत पर जाकर भगवान सदाशिव से या प्रार्थना की है प्रभु अर्जुन आपकी कठोर आराधना कर रहा है आज तो हमारी या इच्छा है कि आप उसके पास पहुंचकर वर प्रदान करने की कृपा करें शिव जी ने अत्यंत प्रसन्न होकर यह उत्तर दिया है ऋषियों आप लोग अपने-अपने स्थान को जाए हम अर्जुन के कार्य को पूरा करेंगे

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Brahma Ji said, O Narad, after Vyas Ji left, all the brothers saw Arjun in a very radiant form. He blessed Arjun and sent him off to do penance. He bowed to everyone and left to do penance of Lord Shiva at an auspicious time. He reached near a place called Indra Ki on the banks of Ganga Ji and settled in Shok Van. There, first of all, he made an altar and worshipped the Guru. Thereafter, he sat on the seat and made a five-sided ritual and then started chanting the mantra of traveller's worship. O Narad, due to the effect of penance, light started emanating from his forehead. At that time, Indra's servants living in the forest went to Indra and prayed that O Lord, who knows which ascetic is doing penance in Ashoka forest, due to the fire emanating from whose forehead we are all about to burn. After listening to the servants, when Indra thought carefully, he came to know that this work is of our son Arjun. Indra was also very sad to see his son Arjun sad. Two provinces were divided and he took the form of a Brahmin and took his hand. With a stick in his hand he went and stood near Arjun. When Arjun saw Indra standing in front of him in the guise of a Brahmin, he welcomed and honoured him in every way. At that time Indra asked Arjun, son of Chhatri, why are you being so harsh? O Narada. Hearing the words of Brahmin Rupendra, Arjun narrated the whole incident to him. Then Indra replied, Arjun, your doing this is futile. Worldly pleasures last for a few days. Man should not get involved in these pleasures and should think of salvation. Salvation is not in Indra's control. You should worship the god who can grant salvation. Hearing this Arjun replied, Brahmin, what do you have to do with these things? We are doing our work according to the instructions of Vyas ji. Today, please do not give us advice contrary to that. When Indra saw Arjun's determination, he fell in love with Arjun. At that time he appeared in his real form and said, son, I had tested you by becoming a Brahmin. Shiva is the one who grants salvation. By his grace, we Brahmins and Vishnu have attained high positions. So, from today onwards, you should abandon our mantra and worship Shiva. Chant the mantra and after doing economic worship, meditate on him. There will be no rule of any kind in your worship and Shiva ji will be pleased and will grant you the boon. Oh Narada. Saying this and giving blessings, Indra left with his people. Then Arjun took bath and after doing further arrangements, meditated on Shiva ji. After that, after doing earthly worship, he stood in front of the Sun on one leg and started chanting Shiva mantra. Seeing his book, even the sages and monks were surprised. Then some time passed in praying to Arjun. Then the sages went to Mount Kailash and prayed to Lord Sadashiv that Lord Arjun is doing your rigorous worship. Today, it is our wish that you reach him and kindly grant him a boon. Shiva ji, being very pleased, gave this answer that sages, you all go to your respective places, we will complete Arjun's task.

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