ब्रह्मा जी बोले हे नारद हेतु वन में जाकर पांडवों ने अनेक प्रकार की विपत्तियां उठाई उसके पास भोजन में निर्मित सूर्य का दिया हुआ वही पत्र था उसे पत्र में किया गुण था कि जब तक द्रोपती भोजन नहीं कर लेती तब तक उसके भीतर की भोजन सामग्री समाप्त नहीं होती थी दुर्योधन को किसी प्रकार इस बात का पता चल गया तब उसने यह कहा कि पांडवों को किसी मुनि द्वारा शराब दिला देना चाहिए वास्तु वह दुर्वास के पास पहुंचकर उसकी बड़ी सेवा की और वरदान मांगने किया गया प्राप्त की दुर्योधन ने उनसे यह कहा हे प्रभु मैं पांडव हूं का नाश चाहता हूं या सुनकर दुर्वासा ऋषि ने लोरिया डॉन को बहुत अधिक देते हुए इस प्रकार कहा है दुर्बोधन ऐसा कभी नहीं हो सकता फिर भी तुमने हमारी सेवा की इसलिए हम तुम्हारी प्रशांत के निर्माता कुछ उपाय करेंगे हे नारद दुर्योधन से इस प्रकार कहकर दुर्वासा ऋषि अपने साथ 10 सहस्त्र शिष्यों को लिए हुए पांडवों के पास उसे समय पहुंचे जिस समय द्रोपती भोजन कर चुकी थी पांडवों ने मुनि की यथाविधि पूजा की उसे समय दुर्वासा ने उनसे कहा है पांडव हम तुमसे भोजन प्राप्त करना चाहते हैं मुनि के यह वचन सुनकर अतिथि पांडव अपने मन में बड़े हताश हुए फिर भी उन्होंने स्वीकार कर लिया तब मुनि अपने शिष्यों सहित स्नान करने के लिए नदी तट पर चले गए इधर पांडवों ने सोचा कि उन्हें के लौटते तक भोजन तैयार हो सकता कठिन है इससे अच्छा है कि हम सब लोग मुनि के आने से पूर्व ही मर जाए अन्यथा मुनि हमें शराब देकर नष्ट कर डालेगा जिस समय पांडव इस प्रकार विचार कर रहे थे उसी समय यह आकाशवाणी हुई थी यह पांडव तुम किसी प्रकार की चिंता ना करें श्री कृष्णा जी का स्मरण करो तुम्हारा संकट दूर हो जाएगा हे नारद इस आकाशवाणी कुसुम का द्रौपदी सहित सभी पांडवों ने श्री कृष्ण चंद्र जी का स्मरण किया तब श्री कृष्ण जी शीघ्र ही उसके पास आ पहुंचे उन्होंने सूर्य के दिए हुए पत्र को द्रौपदी से मांगा और उसे पत्र से सहायक की एक बत्ती चिपकी हुई देखकर उसे खा लिया श्री कृष्ण जी द्वारा उसे पट्टी के खाते ही उधर दुर्वासा ऋषि अपने शिष्यों सहित ही तृप्त हो गए तत्व प्रांत हुए पांडवों के पास आकर नदी तट से ही अपने आश्रम को चले गए इस समाचार को सुनकर पांडवों को अत्यंत प्रसन्नता हुई और वह सब श्री कृष्ण जी की स्तुति करने लगे उसे समय श्री कृष्ण जी ने उन्हें धर्य बनते हुए कहा है पांडव अब हम मथुरा को छोड़ द्वारिका पुरी भाषा कर उसमें हार रहे हैं हम तुमसे यह कहते हैं कि तुम भगवान सदा शिव की सेवा किया करो शिवजी की सेवा किए बिना संकट दूर नहीं होगा
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Brahma Ji said O Narada, after going to the forest the Pandavas faced many hardships. He had the same paper given by Surya in the food. The quality of the paper was that until Draupadi ate the food, the food material inside it would not finish. Duryodhan somehow came to know about this and then he said that some sage should give wine to the Pandavas. He went to Durvasa and served him a lot and got the boon. Duryodhan said to him, O Lord, I want the destruction of the Pandavas. On hearing this, Durvasa Rishi gave a lot of money to Loria Don and said, Durbodhan, this can never happen. Still you served us, therefore we will find some way to make you peaceful. O Narada, saying this to Duryodhan, Durvasa Rishi along with his 10 thousand disciples reached the Pandavas. When Draupadi had finished eating, the Pandavas worshipped the sage in the proper manner. At that time Durvasa told him, Pandavas said, we want to get food from you. On hearing these words of the sage, the guest Pandavas were very disappointed in their mind, but still they accepted. Then sage along with his disciples went to the river bank to take bath. Here the Pandavas thought that it is difficult for the food to be ready by the time he returns, it is better that all of us die before the sage comes, otherwise sage will destroy us by giving us liquor. When the Pandavas were thinking like this, at the same time this heavenly voice was heard, Pandavas, do not worry at all, remember Shri Krishna ji, your problem will be solved. O Narada, on hearing this heavenly voice, all the Pandavas including Draupadi remembered Shri Krishna Chandra ji, then Shri Krishna ji reached them soon, he asked for the leaf given by Surya from Draupadi and seeing a wick of helper stuck to the leaf, he ate it. As soon as Shri Krishna ji ate the leaf, Durvasa Rishi along with his disciples got satisfied, came to the Pandavas, got satisfied and left for his home from the river bank itself. The Pandavas went to the ashram. On hearing this news, they were very happy and started praising Lord Krishna. At that time, Lord Krishna, while pacifying them, said, "Pandvas, now we are leaving Mathura and going to Dwarkapuri and are losing there. We are telling you that you should always serve Lord Shiva. Without serving Shiva, the problem will not go away."
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