श्री शिव महापुराण कथा सातवां खंड अध्याय 54 का भाग 2



हे नारद पांडवों से इस प्रकार का कर श्री कृष्ण जी अंतर्ध्यान हो गए तत्व प्राण पांडवों ने एक भूल को दुर्योधन के आचरणों की देखरेख के लिए इंद्रप्रस्थ भेजा उसे भूल ने वहां का सब हाल पांडवों को आप सुनाया तब दुर्योधन के प्रताप तथा वैभव का समाचार पाकर पांडवों को अत्यंत दुख हुआ इस समय पांडवों के सम्मुख श्री व्यास जी आप पहुंचे हुए अपने मुख से शिव नाम का उच्चारण कर रहे थे व्यास जी को देखकर पांडवों ने उनका अत्यंत सम्मान किया और पूजा नदी करके उन्हें श्रेष्ठ आसन पर बैठाया फिर इस प्रकार कहा हे प्रभु वन में आकर हम लोग ने बहुत दुख उठाए हैं आज आपकी बड़ी कृपा हुई जो यहां पधार कर हमें दर्शन दिए हे नाथ आप हमारा उद्धार करें तथा ऐसा उपदेश दें जिससे हम अपने राज को पुनः प्राप्त कर ले हे नारद पांडवों की प्रार्थना सुनकर ब्याज जी ने कहा है पांडव तुम परम धन्य हो तुम्हारे ऊपर शिवजी अत्यंत प्रसन्न होंगे और वह तुम्हारे सभी कस्टम को दूर कर देंगे भगवान सदाशिव सबके स्वामी हैं तथा देवता मुनि उसकी सेवा किया करते हैं और तो हम तुम्हें या उपदेश देते हैं कि तुम विश्वास एवं प्रेम पूर्वक भगवान सदा शिव की पूजा करो यह नारद व्यास जी के वचन सुनकर पांडवों ने पूछा है प्रभु हम सब लोग मिलकर शिवजी का पूजन करें अथवा हमें से कोई एक व्यक्ति करें उसे समय ब्याज जी ने शिव जी का ध्यान धरकर या उत्तर दिया तुम में से केवल अर्जुन को ही पूजा करनी चाहिए केवल उसी की सेवा से शिवाजी तुम सब के ऊपर प्रसन्न होंगे इतना व्यास जी ने शिवपूजन की संपूर्ण विधि अर्जुन को बतला दिया तथा यह कहा छतरी को सर्वप्रथम इंद्र की सेवा करनी चाहिए दादू प्राण शिव जी के मंत्र का जाप करो तुम गंगा तट पर इंद्रलोक नामक स्थान में पहुंचकर शिवजी का ध्यान धरो यह कहकर ब्याज देने अर्जुन को इंद्र का मंत्र दिया तथा शिव पूजन की विधि एवं दृष्टिबाधित होने की विद्या प्रदान की इतना करके व्यास जी अंतर ध्यान हो गए

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O Narada, after doing this to the Pandavas, Shri Krishna Ji disappeared. The Pandavas sent a priest to Indraprastha to look after the conduct of Duryodhan. The priest narrated the entire situation there to the Pandavas. Then the Pandavas were very sad on getting the news of Duryodhan's glory and splendor. At this time, Shri Vyas Ji had arrived in front of the Pandavas and was uttering the name of Shiva with his mouth. On seeing Vyas Ji, the Pandavas respected him very much and after worshipping him, made him sit on the best seat. Then they said in this way, O Lord, we have suffered a lot after coming to the forest. Today, you have been very kind to us that you have come here and given us darshan. O Lord, please save us and give us such advice that we can regain our kingdom. O Narada, on hearing the prayers of the Pandavas, Vyas Ji said, Pandavas, you are extremely blessed. Lord Shiva will be very pleased with you and he will remove all your problems. Lord Sadashiv is the master of all and the deities and sages serve him. So we give you this advice that you should worship him with faith and love. Always worship Lord Shiva. On hearing the words of Narad Vyas ji, the Pandavas asked, Lord, should all of us worship Shiva together or should one person among us do it. To this Vyas ji replied by meditating on Shiva that only Arjun among you should worship, only by serving him will Shivaji be pleased with all of you. Vyas ji told the entire method of worshipping Shiva to Arjun and said that the umbrella should first serve Indra. Dadu Pran, chant the mantra of Shiva ji. You reach a place called Indralok on the banks of the Ganga and meditate on Shiva. Saying this, he gave the mantra of Indra to Arjun and imparted him the method of worshipping Shiva and the knowledge of becoming blind. After doing this Vyas ji went into meditation.

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