ब्रह्मा जी बोले हे नारद आप तुम अश्वत्थामा अवतार की कथा सुनो ब्राह्मण में परम श्रेष्ठ द्रोणाचार्य को कौरवों ने अपना गुरु मानकर उसे धनुष विद्या प्राप्त की थी उन्हें द्रोणाचार्य ने कठिन तपस्या द्वारा शिवजी को प्रसन्न किया तब शिवजी ने द्रोणाचार्य के समीप पहुंचकर यह कहा है द्रोणाचार्य हम तुम्हारे तब से अत्यंत प्रसन्न हुए हैं आज तो तुम जो चाहे वर मांग लो यह सुनकर द्रोणाचार्य ने शिवजी की स्तुति करते हुए कहा हे प्रभु यदि आप मुझ पर प्रसन्न है तो यह वरदान दीजिए कि मुझे आपके आंसर से एक पुत्र की प्राप्ति हो वह बालक मुझे सहित कौरवों को आनंद प्रदान करने वाला अत्यंत बलवान तथा मृत्यु को जीतने वाला हो द्रोणाचार्य की प्रार्थना सुनकर शिवजी उन्हें इच्छित वरदान देकर अंतर ध्यान हो गए तब उन्होंने अत्यंत प्रसन्न हो अपनी स्त्री के समीप जाकर सब समाचार का सुनाया कुछ समय पश्चात शिवजी की कृपा और उन्हीं के अंश द्वारा द्रोणाचार्य की पत्नी के घरों से एक बालक ने जन्म लिया उनका नाम अश्वत्थामा रखा गया हे नारद अश्वत्थामा ने द्रोणाचार्य की आज्ञा पाकर कवरों का पक्ष लिया तथा विष्णु जी की प्रेरणा से अर्जुन ने शिव जी का तप किया और शिवाजी द्वारा पाशुपत अस्त्र प्राप्त किया इतने पर भी अश्वत्थामा ने अपना तेज ऐसा प्रदर्शित किया की कोई भी उनका कुछ न बिगाड़ सका जब उसने पांडवों के पुत्रों का वध कर डाला उसे समय अर्जुन ने जब रात पर चढ़कर अश्वत्थामा का पीछा किया था तब अश्वत्थामा अपने मन में कुछ भी भयभीत न होकर युद्ध करने के लिए सामने खड़ा हो गया उसे अर्जुन के ऊपर आपने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर दिया उसे समय अर्जुन ने अत्यंत दुखी होकर श्री कृष्ण जी से यह कहा है श्री कृष्ण जी अश्वत्थामा द्वारा छोड़े गए ब्रह्मास्त्र की ज्वाला हम सबको भस्म करती हुई सामने चली आ रही है आप इसे हमारी रक्षा करने का उपाय करें हे नारद अर्जुन की प्रार्थना सुनकर श्री कृष्ण जी अर्जुन से इस प्रकार बोले हैं अर्जुन तुम इस अस्त्र का प्रभाव समाप्त करने के लिए शिवाजी द्वारा दिए गए पाशुपत अस्त्र का प्रयोग करो उसके बिना इस शास्त्र की ज्वाला किसी प्रकार शांत नहीं होगी यह सुनकर अर्जुन ने पशुपति अस्त्र का प्रयोग करके ब्रह्मास्त्र को निष्फल कर दिया इस दृश्य को देखकर अश्वत्थामा ने यह विचार करके की संसार में पांडवों का वंश ही ना रहे अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु की पत्नी उत्तर के गर्भ में जो बालक स्थित था उसका वध करने से निमता होना अपने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया उसे समय उत्तर अत्यंत व्याकुल होकर श्री कृष्ण के चरण में आ गई श्री कृष्ण ने अपने चक्र द्वारा उतर के गर्भ की रक्षा की है नारद अश्वत्थामा अवतार का यह चरित्र अत्यंत पवित्र और संपूर्ण संसार को आनंद प्राप्त करने वाला है अश्वत्थामा हजार अमर है हुए इस समय भी गंगा के तट पर वास करते हैं तथा सब की दृष्टि से छिपे रहते हैं उसकी कथा सुनने तथा सुनने से अत्यंत पुणे होता है तथा संपूर्ण मनोकामना की प्राप्ति होती है
TRANSLATE IN ENGLISH
Brahma Ji said, O Narada, you listen to the story of Ashwatthama avatar. The Kauravas accepted Dronacharya, the best among Brahmins, as their Guru and learnt the art of archery from him. Dronacharya pleased Lord Shiva by performing austerity. Then Lord Shiva came near Dronacharya and said, Dronacharya, we are very pleased with you since then. Today, you can ask for any boon you want. On hearing this, Dronacharya praised Lord Shiva and said, O Lord, if you are pleased with me, then give me this boon that I get a son from your birth. That child should be very strong and conqueror of death, who will give joy to me and the Kauravas. On hearing Dronacharya's prayer, Lord Shiva gave him the desired boon and went into deep meditation. Then, he became very pleased and went near his wife and told her the whole news. After some time, by the grace of Lord Shiva and his part, a child was born in the house of Dronacharya's wife. He was named Ashwatthama. O Narada, Ashwatthama, after getting the permission of Dronacharya, took the side of the Kauravas and with the inspiration of Lord Vishnu, Arjuna performed austerity for Lord Shiva. and received the Pashupat weapon from Shivaji. Even then Ashwatthama displayed his might in such a way that nobody could harm him. When he killed the sons of the Pandavas, at that time Arjuna chased Ashwatthama on the night, then Ashwatthama, without being afraid in his heart, stood up to fight and used his Brahmastra on Arjuna. At that time Arjuna being very sad said to Shri Krishna that Shri Krishna ji, the flame of the Brahmastra released by Ashwatthama is coming towards us burning us all, you find a way to protect us from it. O Narada, on hearing Arjuna's prayer, Shri Krishna ji spoke to Arjuna in this way, Arjuna, to end the effect of this weapon, use the Pashupat weapon given by Shivaji, without it the flame of this weapon will not calm down in any way. On hearing this, Arjuna used the Pashupati weapon and rendered the Brahmastra ineffective. On seeing this scene, Ashwatthama, thinking that the lineage of the Pandavas should not remain in the world, Arjuna's son Abhimanyu's wife Uttar He used his brahmstra to kill the child who was in her womb. At that time, Narad became very distraught and came to the feet of Shri Krishna. Shri Krishna protected the womb by his chakra. This character of Narad Ashwatthama incarnation is very sacred and brings joy to the entire world. Ashwatthama is immortal and even today he lives on the banks of Ganga and remains hidden from everybody's sight. Listening to his story gives immense pureness and all the desires are fulfilled.
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