श्री शिव महापुराण कथा सातवां खंड अध्याय 49 का भाग 2



हे नारद शिवजी की आज्ञा सुनकर जब मैं अपने लोग को लौट आया तब शिवजी उपायों की परीक्षा लेने के लिए इंद्र का स्वरूप धारण कर उसके समीप जा पहुंचे उन्होंने गिरजा का स्वरूप सांची जैसी बनाकर नदी को गिरावट हाथी का स्वरूप प्रदान किया तथा गांव को देवताओं के रूप में परिवर्तित कर अपने साथ ले लिया इस प्रकार हुए उपाय के पास जाकर कहने लग ही उपमऊ तुम्हारी जो इच्छा हो वह और हमसे मांग लो यह सुनकर जब उपमेयों ने अपने नेत्र खोलकर उन्हें देखा तो यह समझा कि मेरे सामने इंद्र खड़े हुए हैं आज तू उसने हाथ जोड़कर यह कहा है देवराज इंद्र मैं आपको प्रणाम करता हूं आप कृपा करके मुझे शिवजी का तब करने की शक्ति प्रदान करें मैं शिव जी की अतिरिक्त आने किसी से वार नहीं मांगूंगा वह के मुख से वचन सुनकर इंद्र रूप शिव जी ने उत्तर दिया है मोनू पुत्र हम सब देवताओं के राजा इंद्र हैं तुम हमारा पूजन करके और जो जी चाहे वह वर मांग लो शिवजी दक्ष प्रजापति के शराब के कारण भूत स्वरूप है तथा परम हर रूप वेधारी हैं इसलिए आप उनका कोई वचन सत्य नहीं होता भला ऐसा देवता की पूजा करने से तुझे क्या लाभ हो सकेगा हे नारद इंद्र रूपी शिव जी के मुख से यह वचन सुनकर रूप में उन्हें कात्यान क्रोध में भरकर इस प्रकार कहा है इंद्र क्या तुम्हारी बुद्धि को मंदिर हो गई है जो तुम शिवजी को नहीं पहचान पाए शिवजी तीनों गानों से परिशुद्ध पवित्र निर्गुण सदगुरु परम ब्रह्म तथा उसके स्वामी है मैं तुम्हारे द्वारा शिवजी की निंदा सुनी है इसलिए मुझे भी अत्यंत पाप लगेगा आप मुझे उचित है कि मैं तुम्हें भी नष्ट का डालूंगा और स्वयं भी मर जाऊंगा इतना कहा करो मैं उन्हें भस्म लेकर मंत्र पढ़ा और स्वयं सब प्रकार से पवित्र हो उसे भस्म को इंद्र रूपी शिवजी पर छोड़ दिया साधु प्रांतीय इच्छा प्रकट की इस भस्म के द्वारा मैं स्वयं भी जलकर भस्म हो जाऊंगा उपमा योगी की ऐसी निष्ठा देखकर शिवजी अत्यंत प्रशांत हुए इसी पर समय शिव जी के संकेत को समझ कर नंदी ने उसे ब्राह्मण को अपने हाथ में पकड़ लिया जिसे प्रगट होने वाली प्रज्वलित अग्नि शांत हो गई हे नारद इस चरित्र को करने के उपरांत शिवजी अपने मुख रूप से उपाय के सम्मुख प्रगट हो गए उसे समय सब देवता भी उसे स्थान पर जा पहुंचे तथा शिवजी की स्तुति करने लगे उपमा योगी जब शिवजी के सम्मुख खड़ा देखा तो चरणों में गिर उन्हें प्रणाम किया तथा बहुत प्रकार से स्तुति करते हुए अपने अपराध की क्षमा मांगी उसे समय शिव जी ने उपमा अपने समय बुलाकर उसके संपूर्ण शरीर पर हाथ तेरा फिर अपने पास बैठ कर कृपा दृष्टि से देखते हुए इस प्रकार कहा है उपमा योग हम तुमसे अत्यंत प्रसन्न है आज से गिरजा तुम्हारी माता और हमार हम तुम्हारे पिता होंगे तुमसा देव विवाह बने रहोगे कथा किसी प्रकार का पाप तुम्हें कभी नहीं लगेगा तुम्हारे ऊपर मृत्यु का कोई वास नहीं चलेगा तुम्हें दूध दही खरीद तथा शहर के अनेक समुद्र प्राप्त होंगे हमारे भक्तों में तुम्हारा स्थान अत्यंत ऊंचा होगा कितना खाकर शिवजी अंतर ध्यान होंगे तब उपाय भी अपने आश्रम को लौट आए हैं नारद इस चरित्र को जो कोई पड़ता था सुनता वह भी सत्यवानंदित रहता है

TRANSLATE IN ENGLISH 

O Narada, when I returned to my people after listening to Shivji's command, then Shivji took the form of Indra to test the remedies. He made the church like Sanchi, gave the river the form of an elephant and transformed the village into deities and took it with him. Thus, going near the remedy, he started saying, Upamayu, ask for whatever you wish from us. Hearing this, when Upamayu opened his eyes and saw him, he understood that Indra is standing in front of me. He folded his hands and said this, Devraj Indra, I bow to you, kindly give me the power to worship Shivji. I will not ask for boons from anyone except Shivji. Hearing the words from his mouth, Shivji in the form of Indra replied, Monu son, we are Indra, the king of all gods. You worship us and ask for whatever boon you wish. Shivji is in the form of a ghost due to the curse of Daksh Prajapati and is the ultimate form holder, that is why none of his words come true. What benefit can you get by worshipping such a god, O Narada, after listening to these words from Shivji in the form of Indra, Katyayan filled him with anger and said to him Indra, has your intellect become corrupt that you could not recognize Shiv Ji. Shiv Ji is pure from all the three gunas, holy, Nirgun Sadguru Param Brahma and his master. I have heard you slander Shiv Ji, therefore I will also commit a great sin. It is appropriate for me to destroy you and also die myself. Just say this much, I took ashes and recited mantra and purified myself in every way and left that ash on Shiv Ji in the form of Indra. The saint expressed his wish that I myself will also be burnt to ashes by this ash. Shiv Ji became very calm after seeing such devotion of Upma Yogi. At this time, understanding the signal of Shiv Ji, Nandi held that Brahmin in his hand, due to which the blazing fire that was appearing, got extinguished. Oh Narada, after doing this, Shiv Ji appeared in front of Upma in his mouth form. At that time all the gods also reached that place and started praising Shiv Ji. When Upma Yogi saw Shiv Ji standing in front of him, he fell at his feet and bowed to him and praised him in many ways. While praising her she asked for forgiveness for her crime. At that time Shiv Ji called her Upma and touched her entire body, then sitting beside him and looking at her with kindness said this: Upma Yog, we are very pleased with you. From today Girja will be your mother and I will be your father. You will remain a Dev Vivah (devotional marriage). Katha, you will never commit any kind of sin. Death will not have any power over you. You will get milk, curd and many seas of the city. Your position will be very high among our devotees. After eating how much Shiv Ji would meditate, then Upaay also returned to his ashram. Narada, whoever used to read and listen to this story also remains delighted.

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