श्री शिव महापुराण कथा सातवां खंड अध्याय 48 का भाग 2



हे नारद ब्रह्माणी के एसे वचन सुनकर शिवजी अत्यंत प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोल ही ब्राह्मणी यह विदर्भ देश के राजा 17th का पुत्र है इसके पिता को राजा साल में युद्ध में मार डाला तब इसकी माता वन में भाग कर चली आई इस बालक को जन्म देने के उपरांत जब वह पानी पीने के लिए तालाब पर गई तब एक ग्रह में उसे पकड़ कर पानी में खींच लिया और खा गय अपने पूर्व जन्मों के कर्मों के कारण ही ऐसा दुख भोगना पड़ा है अब तुम इसका प्रसन्नता पूर्वक पालन करो शिवजी के मुख से ऐसे वचन सुनकर उसे ब्राह्मणी ने अत्यंत आश्चर्य में भरकर कहा हे प्रभु आप मुझे इस बालक के पूर्व जन्म का वृतांत सुनने की कृपा करें माय तथा मेरा यह बालक भी अत्यंत दरिद्र है इसका कारण क्या है कृपा करके यह भी बताएं हीनारद ब्रह्माणी की बात सुनकर शिवजी ने उत्तर दिया है ब्राह्मणी पूर्व जन्म में इस बालक का पिता मांडव देश का राजा था जो कि दक्षिण दिशा में बसा हुआ है वह हमारा परम भक्त था तथा सदेव प्रदोष व्रत धारण किया करता था एक दिन वह राजा प्रदोष व्रत किए हुए शिव जी का पूजन कर रहा था उसी समय उसे नगर के बीच में बड़ा कोलाहल सुनाई दिया राजा उसे शब्द को सुनकर हमारा पूजन त्याग बीच में ही उठकर चल दिया उधर से मंत्री को शत्रु को पकड़ कर अपने साथ ला रहा था जिसे नगर में आकर उपद्रव मचा दिया था राजा के स्वामी प्रकार मंत्री ने संपूर्ण वृतांत कहा तथा शब्द रूप हो उसके सामने उपस्थित कर दिया उसे समय राजा ने अत्यंत क्रुद्ध में भर कर उसे मनुष्य का शरीर अपने हाथ में काट डाला दादू प्रांत वह इस अवस्था में बैठा हमारा पूजन त्याग भोजन करने बैठ गया उसकी पुत्र भी धर्म का पालन नहीं किया इसलिए हम इस जन्म में वह राजा विदेशी देश का राजा बनकर सर्विस के हाथों से मारा गया तुम्हारे सामने जो बालक पृथ्वी पर पड़ा हुआ है यह उसी का पुत्र है इसकी माता का जिसने ग्रह ने खा लिया है वृतांत यह है कि पूर्व जन्म में यह 17th की रानी थी वहां उसने अपने साउथ को धोखा देकर मार डाला था तुम्हारे पुत्र का यह वृत्तांत है कि यह अपने पिछले जन्म में ब्राह्मण था वहां ही से अपना संपूर्ण जीवन दान देते ही बिताया परंतु किसी को अपनी ओर से कुछ नहीं दिया इस कारण यह इस जन्म में दरिद्र हुआ है आप शिवजी के पूजन कैसे कल्याण होगा हीनारद इतना कहकर शिवजी ने उसे ब्राह्मणी को अपने मुख्य स्वरूप से दर्शन दिए उसे वह अत्यंत प्रसन्न होकर स्तुति करने लगी धातु प्रात जब शिव जी पर ध्यान हो गए तब वह बालक को उठाकर तथा अपने बालक को साथ लेकर चक्र नामक एक गांव में आई और वहीं रहकर वह उन दोनों बालकों का पालन पोषण करने लगी जब वह दोनों बालक कुछ बड़े हुए तो शांडिल्य मनी से शिक्षा प्राप्त कर शिवजी की भक्ति कर दें लगे एक दिन जब हुए दोनों महानदी में स्थान करके शिवजी का बना धारण किया हुआ अपने घर को लौट रहे थे उसी समय शिव जी ने उन दोनों को आपदा भक्त जानकार कृपा पूर्व किया लीला की कि उन्हें मार्ग में धन से भरा हुआ एक घड़ा प्राप्त हुआ उसे खड़े को उठाकर हुए दोनों हफ्ते माता के पास ले आए और उसे सब हल्का सुनाया हे नारद जब उन दोनों को शिव जी का व्रत करते हुए एक वर्ष व्यतीत हो गया तब शिवजी ने यह लीला की की एक दिन उन दोनों ने वैन में एक गंधर्व की कन्या को देखा राजा के पुत्र ने उसके समीप पहुंचकर वार्तालाप करने के उपरांत उसके साथ अपना विवाह कर लिया तत्पश्चात जब वे दोनों बालक बड़े हुए तो शिवजी की कृपा से राजपूत्र ने अपने राजा को पूरा प्राप्त कर लिया उसे समय उनका नाम संसार में धर्मगुप्त प्रसिद्ध हुआ वह ब्राह्मणी भी राजमाता बनकर आनंदपूर्वक अपना समय व्यतीत करने लगी ब्राह्मण के पुत्र का नाम सूचित प्राप्त हुआ उसे धर्म गुप्त ने अपना मंत्री बना लिया शिवजी के अवतार यह कथा अत्यंत पवित्र तथा दोनों लोक में आनंद प्राप्त प्रदान करने वाली है भिक्षु नाथ नमक शिव जी के अवतार का स्मरण करने से मनुष्य की सब प्रकार के कष्ट दूर हो जाते हैं

TRANSLATE IN ENGLISH 

O Narada, on hearing such words of Brahmani, Shivji became very pleased and said thus: Brahmini, this is the son of the king of Vidarbha country. His father was killed in the war of 17th year. Then his mother ran away to the forest. After giving birth to this child, when she went to the pond to drink water, then a snake caught him and pulled him into the water and ate him. Due to the deeds of his previous births, he has to suffer such sorrows. Now you should raise him happily. On hearing such words from the mouth of Shivji, the Brahmini was very surprised and said: O Lord, please let me hear the story of the previous birth of this child. Mother, this child of mine is also very poor. What is the reason for this? Please tell this also. On hearing the words of Narada Brahmani, Shivji replied: Brahmini, in the previous birth, the father of this child was the king of Mandav country, which is situated in the south. He was our great devotee and always used to observe Pradosh fast. One day, that king was worshipping Shiv ji while observing Pradosh fast. At the same time, he was attacked by a snake in the middle of the city. There was a huge commotion. The king, on hearing that voice, got up in the middle of our worship and left. From there, the minister was bringing the enemy with him after capturing him, who had created a ruckus in the city. The minister, like the lord of the king, told the entire story and presented him in the form of words. At that time, the king, in great anger, cut the body of that man with his hands. He sat in this state, abandoned our worship and sat down to eat. His son also did not follow the religion, that is why in this birth, that king became the king of a foreign country and was killed by the hands of the saviour. The child lying on the earth in front of you is the son of his mother who was eaten by the planet. The story is that in the previous birth, she was the queen of the 17th century, there she deceived her husband and killed him. This is the story of your son that he was a Brahmin in his previous birth, from there he spent his entire life giving donations, but did not give anything from his side to anyone. Due to this, he has become poor in this birth. How will the worship of Lord Shiva be beneficial for you, O Narada? Saying this, Lord Shiva appeared to the Brahmin in his main form. She became very happy and started praying. When the child became meditative on Lord Shiva in the morning, she picked up the child and took her son along with her to a village named Chakra and stayed there and started bringing up both the children. When both the children grew up a bit, they got education from Shandilya Mani and started worshipping Lord Shiva. One day, when both of them were returning to their home after taking a dip in the Mahanadi river, wearing the clothes of Lord Shiva, Lord Shiva considered them to be the devotees of the river and graciously performed a leela that they found a pot full of wealth on the way. Both of them picked it up and brought it to the goddess and told her everything. O Narada, when one year passed by them fasting for Lord Shiva, then Lord Shiva performed this leela that one day, both of them saw a Gandharva's daughter in the forest. The king's son went near her and after talking to her, married her. Thereafter, when both the children grew up, by the grace of Lord Shiva, the prince got his king back. At that time, her name became famous in the world as Dharmagupta. She was also a Brahmin. After becoming the queen mother, she started spending her time happily. The name of the Brahmin's son was known. Dharm Gupta made him his minister. This story of the incarnation of Lord Shiva is very pious and provides happiness in both the worlds. By remembering the incarnation of Lord Shiva named Bhikshu Nath, all types of troubles of a man are removed.

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