ब्रह्मा जी बोले हे नारद आप माय कृष्ण दर्शन अवतार का वर्णन करता हूं सूर्य के पुत्र मनु के इस प्रभावों का आदि 10 पुत्र उत्पन्न हुए मनु के नवे पुत्र का नाम वही था जब वह अपने गुरु के घर विद्या पढ़ने के लिए दया उसे बीच में इस राहु का आदि उसके आमने नव भाइयों ने पिता से अलग होकर उसके धन को वापस में बांट लिया उन्होंने वह का कोई भी साबुजधान में नहीं रखा जब वह विद्या पढ़कर घर लौटा और उसने सब भाइयों को अपना-अपना भाग लिया हुआ देखा तो यह पूजा की मेरे हिस्से में क्या आया है उसे समय भाइयों ने उसे यह उत्तर दिया है वही जिस समय हम सब लोग भाग कर रहे थे उसे समय दोबारा ज्ञान हमें नहीं रहा था इसलिए अब मैं तुम्हें पिता के दान में कोई भाग नहीं मिल सकता यदि तुम चाहो तो पिता को अपने भाग में ले लो यह सुनकर वाहक अत्यंत आचार्य चकित हो अपने पिता के पास पहुंचा और यह कहने लगा है पिता भाइयों ने मुझे कोई भाग नहीं दिया है तथा कहा मैं कहा है कि मैं अपने बैग में आपको ले लूं यह नारद वही की इस बात सुनकर मनु ने आश्चर्य में भरकर कहा है पुत्र तुम्हारे भाइयों के वचन उचित नहीं है मैं कोई ऐसी वस्तु नहीं हूं जो तुम हमारे खाने पीने के काम आशा को तुम्हारे भाइयों ने तुम्हारे साथ छल किया है परंतु जब तुम मुझे स्वीकार कर ही रहे हो तो भगवान सदाशिव का ध्यान धरकर मैं तुम्हें एक उपाय बताता हूं वह उपाय यह है कि आप इंग्लिश नमक मुनि एक भारी यज्ञ कर रही है उन्हें 6 दिन की से यज्ञ की युक्ति भूल गई है जिसके कारण उसका यज्ञ पूरा नहीं हो पा रहा है अस्तु तो मुंह जाकर उन्हें उपदेश करो तुम्हारी उद्देश्य से उनका यज्ञ पूरा हो जाएगा तब जो धन यज्ञ करने से शेष बचेगा उसे हुए तुम्हें दे देंगे हे नारद मुनि कैसे वचन सुनकर वही करने इस प्रकार आचरण किया तथा अंधेरा सुनने की यज्ञ को दो सेट पढ़ कर पूर्ण कर दिया तब उनकी राशि मोदी यज्ञ का बच्चा हुआ सावधान वही को देखकर स्वयं बैतूल को चले गए तब वही उसे स्थान को उठाने लगा उसे समय शिव जी ने यह चरित्र किया कि वह अत्यंत सुंदर स्वरूप धारण कृष्ण दर्शन के नाम से प्रसिद्ध हो वही की परीक्षा लेने के लिए उसके समीप जा पहुंचा और इस प्रकार करने लगा अरे तुम कौन बुद्धि इन मनुष्य हो जो हमारे धन को इस प्रकार ले रहे हो हमारी विरुद्ध आचरण करने पर तुम्हारा कल्याण ना होगा शिवजी कैसे वचन सुनकर वही ने कहा है महानुभाव में अपने पिता के आजा से या यहां आया हूं अंगिरा मुनि ने बैकुंज जाते समय यज्ञ से बची हुई इस दांत को मुझे दिया है वही कैसे वचन सुनकर कृष्ण दर्शन रूप शिव ने उत्तर दिया हुआ ही तुम्हारे पिता अत्यंत धर्म महान है वस्तु तुम उसके पास जाकर पूछो कि वादा किस लेना चाहिए वह जो बात कहेंगे उसे हम भी स्वीकार कर लेंगे
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Brahma Ji said O Narada, I am describing to you the Krishna Darshan avatar of Sun's son Manu. Manu had 10 sons. The name of the ninth son of Manu was the same. When he went to his Guru's house to study, Rahu was in his middle. His nine brothers separated from his father and divided his wealth among themselves. They did not keep any of it in custody. When he returned home after studying and saw all his brothers taking their respective shares, he asked what has come in my share. At that time, when we were all dividing, we did not know again at that time. Therefore, now you cannot get any share in father's donation. If you want, you can take father in your share. Hearing this, the Acharya was very surprised and reached his father and started saying that father, brothers have not given me any share and said that I should take you in my bag. Hearing this, Manu was surprised and said that son, the words of your brothers are not right. I am not such a thing that you can take my share with us. Your brothers have cheated you for food and drink, but since you are accepting me, then by meditating on Lord Sadashiv, I will tell you a solution. That solution is that you should go to Narad Muni who is performing a big yagya. He has forgotten the method of yagya since last 6 days, due to which his yagya is not getting completed. So go and preach to him. His yagya will be completed as per your wish. Then the money which will be left after performing the yagya, he will give it to you. O Narad Muni, on hearing such words, he behaved in this way and completed the yagya by reading two sets of darkness. Then his zodiac sign Modi became alert. Seeing him, he himself went to Betul. Then he started lifting him up. At that time, Shiv Ji did this act that he assumed a very beautiful form and became famous by the name of Krishna Darshan. To test him, he went near him and started behaving like this. Hey, what kind of a man are you who is taking our money in this way. If you behave against us, you will not be blessed. On hearing such words, Shiv Ji said, “O great man, I have come here on the orders of my father.” While going to Vaikunj, sage Angira gave me this tooth which was left over from the yagya. On hearing the same words, Shiva in the form of Krishna replied that your father is a very religious person and you should go to him and ask him what promise should be taken from him, we will accept whatever he says.
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