श्री शिव महापुराण कथा सातवां खंड अध्याय 47 का भाग 2



हे नारद यह सुनकर वाहक मुनि के पास आया और उसने इस प्रकार बोला है पिता अंगिरा मुनि तो मुझे धन देकर बैकुंठलन को चले गए परंतु उत्तर दिशा से आया हुआ एक मनुष्य मुझे वह ध्यान नहीं लेने देता उसका कहना है कि यह मेरा धन है आज तो तुम इसे नहीं ले सकते जब उसके पूछने पर मैंने अपना नाम बताया तो उसने यह कहा कि तुम अपने पिता के पास जाकर पूछो इस संबंध में वह जो कहेंगे मैं उसे स्वीकार करूं कर लूंगा आज तुम मैं आपसे पूछने आया हूं कि आप मुझे क्या करना चाहिए यह सुनकर मुनि ने आश्चर्य में भरकर शिवजी का ध्यान किया तो उन्हें यज्ञ जान पड़ा कि कृष्ण दर्शन रूप में शिवजी है तब उन्होंने वहीं से कहा यह पुत्र जो व्यक्ति तुम्हें दान लेने से रोक रहा है वह अन्य कोई नहीं अभी तो साक्षात सदाशिव है यज्ञ की जो सामग्री से बच जाती है उसे पर भगवान सदाशिव का ही अधिकार होता है इस समय में तुम्हारे ऊपर कृपा करके तुम्हें दर्शन देने के लिए पधारे हैं तुम्हें उचित है कि तुम उसके पास जाओ और अपनी सेवा द्वारा ने प्रसन्न करो मैं भी तुम्हारे साथ चलकर उसे परम प्रभु के दर्शन करूंगा कृष्ण दर्शन रूप सिंह की बहुत प्रार्थना की इस समय में तथा शिवाजी विष्णु सब देवता सहित इस स्थान पर जा पहुंचे तथा भगवान सदाशिव के उसे स्वरूप को देखकर अत्यंत प्रसन्न हो वस्तु करने लगे तब कृष्ण दर्शन रूपी शिवजी ने वहीं से इस प्रकार का है वही तुम्हारी सत्यता को देखकर हम अत्यंत प्रसन्न हुए हैं अब हम तुम्हें संपूर्ण धन अपनी ओर से देते हैं तुम इसे प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार करो हम तुम्हें यह भी वरदान देते हैं कि तुम अपने पिता सहित मुक्ति को प्राप्त करोगे कितना का कर शिवजी अंतर ध्यान हो नेता दोपरांत सब देवता भी वही को आशीर्वाद देकर अपने-अपने लोगों को चले गए शिव जी के आशीर्वाद से वही चक्रवर्ती राजा हुआ अंत में वह अपने पिता सहित शिवपुरी को गया और वहां उसकी गांड शिव जी के गानों में हुई इस चरित्र को जो सुनता अथवा सुनता है उसे भी दोनों लोग में आनंद की प्राप्ति होती है

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O Narada, on hearing this, Vahak came to Muni and said this. Father Angira Muni gave me money and went to Vaikunthalan, but a man who came from the north direction does not let me take that donation. He says that this is my money, today you cannot take it. When I told him my name on his asking, he said that you go to your father and ask him, I will accept whatever he says in this regard. Today I have come to ask you what should I do. On hearing this, Muni was surprised and meditated on Shiva and he felt that the yagya was Shiva in the form of Krishna Darshan. Then he said from there, this son, the person who is stopping you from taking the donation is none other than Sadashiv himself. The material which is left from the yagya has the right over it. At this time, he has blessed you and come to give you darshan. It is appropriate for you to go to him and please him with your service. I will also go with you and give him darshan of the supreme lord. I prayed a lot for Krishna Darshan form Singh at this time and Shivaji Vishnu all They reached the place along with the gods and on seeing that form of Lord Sadashiv they were very pleased and started praying, then Shiva in the form of Krishna Darshan said from there that on seeing your truthfulness we have become very pleased, now we are giving you all the wealth from our side, you accept it happily, we also give you the boon that you will attain salvation along with your father, after doing so much Shivaji meditate, after that all the gods also blessed him and went to their respective people, with the blessings of Shiva he became an emperor, at last he went to Shivpuri along with his father and there he was killed. Whoever listens to this character in the songs of Shiva ji, also gets pleasure in both the worlds.

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