ब्रह्मा जी ने कहा हे नारद तत्पश्चात राम लक्ष्मण ने अगस्तती मुनि को देखकर दोनों हाथ जोड़ सर नया कर प्रणाम किया उसे समय मुनि ने राम लक्ष्मण को अत्यंत दुखी देख इस प्रकार कहा हे राम तुम स्त्री के लिए इतना दुख क्यों करते हो स्त्री किसी की नहीं होती केवल जीव ही सब इंद्रियों से मरे हैं उनका कोई आकर भी नहीं है तो वह सब हुए विद्यमान है बात को ना समझ कर बुद्धि के विरुद्ध सब कार्य कर रहे हो केवल यही सोचकर संतोष करो कि यह सारी नसवान है आत्मा कभी नहीं मारता ब्रह्मा एक है वे तू नहीं फिर कौन स्त्री तथा कौन पुरुष है इसलिए है रामचंद्र तुम सीता के वियोग का दुख दूर करो व्यर्थ की मोह के वश में पढ़ने से कोई लाभ न होगा वस्तु तुम शिवजी का स्मरण कर अपने दुख को दूर करो हे नारद अगस्त्य मुनि के ऐसे वचन सुनकर रामचंद्र जी बोले हे मुनीश्वर आपने अभी यह कहा है की आत्मा शरीर से भिन्न है तथा शरीर जड़ है उनका कोई दुख नहीं हो सकता तब आप मुझे यह बताओ दीजिए कि दुख किसी को होता है मुझ पर इस समय सीता के वियोग का डा है वही मेरे शरीर को जला रहा है जो बात शरीर में हम प्रतिदिन देखते हैं उसके लिए आप क्या कहते हैं मैं आपसे पूछता हूं कि दुख सुख का भोगने वाला कोई है भी या नहीं यह सुनकर अगस्त्य मुनि बोले है रामचंद्र शिव जी की माया अपार है उसका नाम प्राकृतिक है उसी से संपूर्ण संसार की उत्पत्ति हुई है उसे प्रकृति का स्वामी शिव जी को ही समझो पुरानी वासना ही संसार का क्षेत्र यज्ञ है चार प्रकार का अंतरण उसे प्रकाशित होता है जीवन अपने कर्मों का फल प्राप्त करता है तथा उन्हें भोक्ता है सब दुख सुख अपने कर्म अनुसार ही होते हैं माया के बंधन से दुख सुख है जो माया से भिन्न है वही संसार पर प्रबल है यह सुनकर रामचंद्र जी ने कहा हे मुनीश्वर आपने जो कुछ कहा वह सब उचित है परंतु फिर भी हमारा दुख किसी भी प्रकार दूर नहीं होता जिस प्रकार वेद बड़े-बड़े विद्यमान को मस्ताक्स कर देते हैं उसी प्रकार भाग्य की भोग भी अत्यंत दुखी है सब लोग इस भाग्य के वश में है उसे पर किसी का वास नहीं चलता सब दुख सुख भी उसी से होते हैं हमने भाग्य को सर्वोपरि शिवजी के समान समझ लिया है वही मुझे इस समय दुख दे रहा है आप मेरी इच्छा है कि जिसने मेरी स्त्री का हरण किया है मैं उसका वध कर डालूंगा मैं सूर्यवंशी राजा दशरथ का पुत्र हूं यदि शीघ्र ही उनका वध ना करूंगा तो मेरा जीवन निष्फल है आज तू जब तक मैं सीता हरण करता का वध नहीं करूंगा तब तक यह अग्निशत नहीं होगी रामचंद्र जी के इन अहंकार पूर्ण वचनों को सुनकर अगस्त्य मुनि ने यह जान लिया कि उनके उपदेश निष्फल गया है तब उन्होंने अपने मन मे कुछ क्रोध करके फिर इस प्रकार कहा हे राम तुम जो शब्द कह रहे हो सो तुम्हारा दोस्त नहीं है यह शिवजी की माया के कारण ही है क्योंकि सब देवता मुनि आदि इस माया में भटक कर सुख-दुख प्राप्त करते हैं तुम अपने स्त्री को प्राप्त करने हेतु रावण का वध करना चाहते हो वस्तु रावण अत्यंत बलवान तथा शक्तिशाली देश का स्वामी है भला तुम उसकी लंका में पहुंच कर अपनी सीता को किस प्रकार प्राप्त कर सकोगे शिवजी की कृपा से वह संपूर्ण संसार राजा बंद हुआ है तुम अपने और अपने पुत्र की शक्ति की तुलना नहीं करते हो रावण का डर स्वर्ण से बनता हुआ है कोई भी देवता और देते उसे नहीं जीत सकता जिस रावण के पास करोड़ों चतुर रागनी सुना विद्यमान है तुम उसे जीतना चाहते हो इतना कहकर अगस्ती म्युनिख चुप रह गए
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Brahma Ji said O Narada. Thereafter, Ram and Lakshman saw Agastya Muni and bowed their heads with folded hands. At that time, Muni seeing Ram and Lakshman very sad said, O Ram, why do you feel so sad for a woman? A woman does not belong to anyone. Only the living beings have lost all their senses. They do not have any form either. They all exist. Without understanding the matter, you are doing all the things against your intellect. Be satisfied by thinking that all these are living beings. The soul never dies. Brahma is one, he is not you. Then who is a woman and who is a man? Therefore, Ramchandra, you should remove the pain of Sita's separation. There will be no benefit in being under the influence of useless attachment. You should remember Lord Shiva and remove your pain. O Narada. On hearing such words of Agastya Muni, Ramchandra Ji said, O Munishwar, you have just said that the soul is different from the body and the body is inert, it cannot have any pain. Then, please tell me, who feels pain? At this time, the pain of Sita's separation is burning my body. The thing that we see in the body every day, So what do you say, I ask you whether there is anyone who can enjoy the happiness and sorrow or not. Hearing this, Agastya Muni said, Ramchandra, the Maya of Lord Shiva is immense. Its name is Prakriti. The whole world has originated from it. Consider it to be the lord of nature, Lord Shiva. The old desire is the area of the world, Yajna. Four types of transformations are manifested in it. Life receives the fruits of its deeds and enjoys them. All sorrows and happiness are according to one's deeds. There is sorrow and happiness due to the bondage of Maya. The one who is different from Maya is dominant in the world. Hearing this, Ramchandra said, O Munishwar, whatever you said is right, but still our sorrow does not go away in any way. Just as the Vedas make the great gods go crazy, similarly the enjoyment of destiny is also very sad. Everyone is in the control of destiny. No one can control it. All sorrows and happiness are also caused by it. We have considered destiny to be supreme like Lord Shiva. It is he who is causing me pain at this time. It is my wish that I will kill the one who has kidnapped my wife. I am a Suryavanshi. I am the son of King Dasharath. If I do not kill him soon, my life will be futile. Today, unless I kill the person who kidnapped Sita, this fire will not be destroyed. Hearing these arrogant words of Ramchandra Ji, Agastya Muni realized that his advice had gone in vain. Then, with some anger in his mind, he said, O Ram, the words you are saying are not your friend. This is only due to the illusion of Lord Shiva because all the gods, sages etc. get lost in this illusion and experience happiness and sorrow. You want to kill Ravana to get your wife. Ravana is a very strong and powerful king. How will you be able to get your Sita after reaching Lanka? By the grace of Lord Shiva, the whole world has become a king. You do not compare your strength with that of your son. Ravana's fear is made of gold. No other god can defeat him. You want to defeat Ravana who has crores of clever raginis. Saying this, Agastya Muni remained silent.
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