श्री शिव महापुराण कथा सातवां खंड अध्याय 34



नारद जी ने कहा हे पिता रामचंद्र जी के चरित्र का विस्तार पूर्वक वर्णन कीजिए रामचंद्र जी बोले हे नारद विष्णु जी ने देवताओं के कार्य के लिए पोषक से यह अवतार धारण किया था उन्होंने अनेक बाल चरित्र किया जिसे देखकर उसके माता-पिता अत्यंत आनंदित हुए उन्होंने फिर विश्वामित्र के साथ जाकर उसके यज्ञ की रक्षा की तथा स बहू की सेन सहित मार डाला उन्होंने विश्वामित्र के साथ जनकपुर में जाकर राजा जनक की इच्छा अनुसार स्वयं तथा अपने तीनों भाइयों का विवाह किया इसके पश्चात जब राजा दशरथ आपने तथा पुत्रवधू सहित अयोध्या को लौट उसे समय के आनंद का वर्णन नहीं किया जा सकता निदान देवताओं ने अपने कार्य के सीट के लिए अनेक उपाय करके भक्त की ममता के इकाई को रामचंद्र जी के विरुद्ध भड़का दिया जिसके परिणाम स्वरुप कैकई ने रामचंद्र जी को रात से कहा कर वनवास दिलाया अयोध्या से वन को जाते समय रामचंद्र जी सर्वप्रथम त्रिकूट को गए वहां उन्होंने मगध शिवजी की पूजा की उसे मूर्ति को मैंने ही वहां स्थापित किया था वही शिवजी त्रिकूट के रक्षक हैं जो मनुष्य त्रिकूट में जाकर उसकी पूजा ना करें उसे वहां जाने का कोई फल नहीं मिलता भारत अयोध्या वीडियो सहित रामचंद्र जी के पास पहुंचे उन्होंने हाथ जोड़कर बड़ी भक्ति के साथ रामचंद्र जी से लौटने की विनती की परंतु रामचंद्र जी ने उनकी बात ना मानकर तथा अपनी पदक देखकर उन्हें विदा कर दिया कुछ दिनों के पश्चात वहां से हुए दंडवक वन को गए जहां ऋषि मुनि निवास करते हैं मार्ग में उन्हें विराट को जो सीता को उठाकर उठाया था मार डाला फिर वह कुंभा मुनि के पास पहुंचे हो अगस्त में से उपदेश प्रकार सीता तथा लक्ष्मण सहित पंचवटी को गए सुपुर्द में आकर उनसे विवाह की इच्छा प्रकट की जब रामचंद्र जी और लक्ष्मण ने उसकी इच्छा पूरी न की तब वहां यह कह कर की अब तुम अपने किए कम फल पाओगे सीता को डरने लगी तब लक्ष्मण ने क्रोधित होकर उसके नाक कान काट लिए ही नारद वहां से रोटी पेटी अपने भाई दुष्ट के पास गई तथा उसे सब वृतांत का सुनाया अपनी बहाने की यह दशा देखकर करता था दुष्ट सुपरस्टार को आगे कर रामचंद्र ने से उसके अपमान का बदला लेने के लिए युद्ध करने गई उसे समय रामचंद्र जी ने सीता जी को लक्ष्मण की सुरक्षा में रखकर अकेले ही सपोर्ट के अतिरिक्त समस्त राक्षसों को मार डाला सुपुर्द का यह दशा देख वहां से रोती हुई रावण के पास पहुंची और आदि से अंत तक सब वृतांत का सुनाया रावण ने सुपुर्द के मुख से रामचंद्र जी की वीरता का समाचार सन क्रोधित होकर मर्जी को सीता के हरण के लिए कहा रावण का मामा मस्जिद विचित्र मृग का स्वरूप धारण कर सीता के सामने पहुंचा उसे समय रामचंद्र जी सीता के हाथ तथा अमृत के चल में आकर अमृत का वध करने के लिए उसके पीछे-पीछे चल दिए जब बहुत देर होने पर भी लक्ष्मण ने रामचंद्र जी को लौटते ना देखा तो हुए सीता को वही अकेले छोड़ रामचंद्र जी की खोज में चले इस प्रकार रामचंद्र जी और लक्ष्मण के चले जाने के पश्चात रावण ने अवसर देखकर सीता को उठा लिया और लंका को भाग मार्ग में सीता को रोते देखा जटायु ने रावण से युद्ध किया परंतु रावण ने जटायु के पंख काट डाले इधर जब रामचंद्र जी तथा लक्ष्मण लौटे तो वहां सीता को न पाकर मुर्जित हो पृथ्वी पर गिर पड़े तथा रोते हुए पूरे वन में सीता को ढूंढने चले आगे चलकर उन्हें जटायु से संभल मालूम हुआ जटायु ने रामचंद्र जी को संभाल बताया अपना शरीर त्याग दिया तब रामचंद्र जी ने स्वयं अपने हाथ से जटायु का दाह संस्कार किया

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Narad ji said, O father, describe the character of Ramchandra ji in detail. Ramchandra ji said, O Narad, Vishnu ji had taken this incarnation from Poshak for the work of the Gods. He performed many childhood characters, seeing which his parents were very happy. He then went with Vishwamitra and protected his yagya and killed his daughter-in-law along with her army. He went to Janakpur with Vishwamitra and got himself and his three brothers married as per the wish of King Janak. After this, when King Dasharath returned to Ayodhya with himself and his daughter-in-law, the joy of that time cannot be described. Ultimately, the Gods, for the sake of their work, took many measures and instigated the unit of devotee's affection against Ramchandra ji, as a result of which Kaikeyi got Ramchandra ji exiled by calling him at night. While going to the forest from Ayodhya, Ramchandra ji first went to Trikuta, where he worshipped Magadha Shiva, whose idol was installed by me only, the same Shiva is the protector of Trikuta. The person who does not go to Trikuta and worship him, does not get any reward for going there. India Ayodhya video of Ramchandra ji When they came near, they requested Ramchandra ji with folded hands to return, but Ramchandra ji did not listen to them and seeing his pride, sent them away. After a few days, they went to Dandavak forest from there where sages and saints resided. On the way, they killed Virat, who had kidnapped Sita. Then they reached Kumbha Muni and after giving advice to him, they went to Panchvati with Sita and Lakshman. After coming to Sudarshan, they expressed their desire to marry her. When Ramchandra ji and Lakshman did not fulfill their wish, then they said that now you will get less fruits of your deeds. Sita started getting scared. Then Lakshman got angry and cut off her nose and ears. Narada left from there and went to his brother, the evil one, and narrated the whole incident to him. Seeing this condition of her, the evil one put the superstar forward and went to fight with him to take revenge for her insult. At that time, Ramchandra ji kept Sita under the protection of Lakshman and single-handedly killed all the demons except Sudarshan. Seeing this condition of Sudarshan, she went to Ravana crying and from beginning to end, she was terrified. Ravana narrated the story. On hearing the news of Ramachandra's bravery from Sudarshan, enraged, he asked Marji to kidnap Sita. Ravana's maternal uncle Masjid, taking the form of a strange deer, reached Sita. At that time, Ramchandra came in contact with Sita's hands and the nectar and followed him to kill the nectar. When even after a long time, Lakshman did not see Ramchandra returning, he left Sita alone there and went in search of Ramchandra. In this way, after Ramchandra and Lakshman left, Ravana saw an opportunity and abducted Sita and fled to Lanka. On the way, he saw Sita crying. Jatayu fought with Ravana, but Ravana cut off Jatayu's wings. When Ramchandra and Lakshman returned, they did not find Sita there, they fell down on the ground in pain and, crying, went to search for Sita in the entire forest. Later, they came to know about Jatayu's whereabouts. Jatayu told Ramchandra to be careful and gave up his body. Then Ramchandra himself performed the cremation of Jatayu with his own hands.

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