श्री शिव महापुराण कथा सातवां खंड अध्याय 33



ब्रह्मा जी ने कहा हे नारद तुम्हें हनुमान नाम के शिव जी के अवतार की कथा सुनाता हूं उन्होंने वह अनार जाति में शरीर धारण कर रामचंद्र जी से बड़ा स्नेहा किया कपिल देव महावीर हनुमान जी शिव जी के ही अवतार हैं एक बार शिव जी ने जब मोहिनी रूप को देखा तो केवल रामचंद्र जी के कार्य के लिए यह लीला किए किए कि वह मोहित होकर उसे मोहिनी रूप से लिपट गए उसे समय शिवजी का वीर्य पृथ्वी पर गिर पड़ा उसे वीर्य को नाग नमक मुनि ने शिव जी के संकट से इस इच्छा से रख लिया कि उसके द्वारा रामचंद्र जी का कार्य सिद्ध होगा दादू प्रांत अंजनी के 11 से हनुमान जी उत्पन्न हुए उनके इस प्रकार कभी अवतार लेने का कारण यह था कि चार मार्च तक रामचंद्र जी ने वैन में शिव जी का बड़ा तप किया था तब शिवजी ने उनकी परीक्षा लेने के पश्चात अपने गांव सहित अवतार लिया सब देवताओं ने भी शिवजी की आज्ञा पाकर बंदर तथा रिच का शरीर धारण कार्य किया जब रामचंद्र जी ने रावण को अत्यंत बलशाली समझकर शिवजी की बड़ी स्तुति की तब शिवजी ने प्रसन्न होकर अंजनी के गर्व से अवतार लिया था उन्होंने सूर्य को ही निकाल लिया इसे देखकर ही देवताओं ने यह अनुभव किया कि वह शिवजी के ही अवतार हैं उन्होंने रामचंद्र जी का संदेश उनकी पत्नी सीता के पास लंका में पहुंचा रावण की अशोक वाटिका कुजाद को उजाड़ लंका को जला कर भस्म किया तथा समुद्र में सेतु बांध जिस समय लक्ष्मण शक्ति के प्रहार से मलित हुए तथा उसकी दशा देखकर रामचंद्र जी को अत्यंत दुख हुआ हनुमान ने औषधि लाकर लक्ष्मण को जीवित किया तथा रामचंद्र जी का दुख दूर किया तब उन्होंने भक्ति भाव की रीति को अपनाकर भक्ति को संसार में प्रसिद्ध किया इसलिए वह रामदूत के नाम से प्रसिद्ध हुए हे नारद शिवजी ने रामचंद्र के कार्य पूर्ण करने के लिए ही हनुमान का अवतार लिया था उन्होंने रावण की भुजा उखाड़ कर राम तथा लक्ष्मण को बहुत हर्षित किया उनकी उपासना से आसन के पपिया ने मुक्ति प्राप्त की है यही दशा विष्णु जी की भी है उन्होंने कृष्ण रूप धारण कर अर्जुन नमक पांडव का सारथी बनकर रात का इतनी कथा सुनकर ब्रह्मा जी बोले हैं नारद समकादिक हमारे चार पुत्र परम सहयोग है वे तीनों लोक में सदाशिव जी की मूर्ति हृदय में धारण कर ब्राह्मण करते रहते हैं एक दिन हुए विष्णु लोक में पहुंचे तथा बैकुंठ को देखकर उन्होंने प्रसन्नता पूर्वक यह इच्छा की कि हम विष्णु जी के दर्शन करेंगे वैसा विचार कर हुए है वीडियो पर कर भीतर चले गए परंतु सातवीं रोड ही पर जय ओम विजय नाम के विष्णु के गानों ने उन्हें रोक लिया और किसी भी प्रकार भीतर नहीं जाने दिया तब संकडिक ने क्रोधित होकर शिवजी की प्रेरणा से उन गानों को यह श्राप दिया कि तुम दोनों अब यहां ना रहोगे तुमने हमको विष्णु जी के मंदिर में जाने से रोका है तुम्हारा यह कर्म राक्षसों के समान है इसलिए तुम दोनों रक्षा हो जाओगे इतने में विष्णु जी भी भीतर से निकल आए उन्होंने संकड़ी की बड़ी स्तुति की दादू प्रांत हुए विष्णु जी को प्रसन्न कर आजा प्रकार हमारे लोग को चले आए समकादिक के शराब से हुए दोनों गण देती के पुत्र होकर कनक शिशु तथा कनक अक्षय के नाम से प्रसिद्ध हुए वह ऐसे बलशाली थे कि उन्होंने तुरंत ही तीनों लोक पर विजय प्राप्त कर लिया तब देवताओं की इच्छा के अनुसार विष्णु जी ने द्वारा रूप धारण कर कनकक्ष को मारा था नरसिंह अवतार लेकर कनक शिशु का उधर क्या डाला उसे उन दोनों गानों को तीन जन्म तक राक्षस होने का श्राप था इसलिए फिर उन्होंने कुंभकरण तथा रावण का जन्म लेकर शिव जी की बड़ी भक्ति की इसके पश्चात उसने तुम्हारे उपदेश से मोहित होकर कैलाश को जड़ से उखाड़ लिया यह देखकर शिवजी ने रावण को श्राप देते हुए यह कहा कि हमारे समान ही कोई मनुष्य उत्पन्न होकर तेरे अहंकार को दूर करेगा हे नारद शिव जी के शाप के कारण ही दोनों राक्षसों ने को मार्ग पड़ा तथा संसार में अनेक उपद्रव किया तब देवता आदि दुखी होकर विष्णु जी के पास गए और रावण का सब वृतांत उसने कहा तब विष्णु जी बोले ही देवता रावण शिव जी का परम भक्त है उसे पर कोई विजय प्राप्त नहीं कर सकता परंतु हम शिवजी किया क्या लेकर मनुष्य का शरीर धारण करेगा और शिवजी की उपासना कर उन्हें से बाढ़ प्राप्त करके रावण का वध करेगा यह कहकर देवताओं को विदा किया तथा स्वयं मनुष्य रूप धारण करने की इच्छा की इस प्रकार उन्होंने अयोध्या पति दशरथ के यह अवतार लिया रामचंद्र जी का विवाह जनक की पुत्री सीता के साथ हुआ था फिर रामचंद्र जी राजा दशरथ की आज्ञा से राज त्याग कर देवताओं के कार्य के लिए वन में गए वहां से सीता को रावण हर ले गया जिसे रामचंद्र जी को बहुत दुख हुआ रामचंद्र जी ने अगस्त्य मुनि से उपदेश ग्रहण कर शिवजी की आराधना की शिवजी ने प्रसन्न होकर रावण के वध किया गया दी तथा रामचंद्र जी को अपना धनुष भर दिया उसे धनुष बढ़ द्वारा रामचंद्र जी ने रावण का वध करके सीता को पुनः प्राप्त किया

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Brahma Ji said, O Narada, I am telling you the story of Lord Shiva's incarnation named Hanuman. He assumed the form of a pomegranate and showed great affection towards Lord Ramchandra. Kapil Dev Mahavir Hanuman Ji is an incarnation of Lord Shiva. Once, when Lord Shiva saw the form of Mohini, he performed this leela only for the work of Lord Ramchandra, that he got fascinated and embraced her in the form of Mohini. At that time, Lord Shiva's semen fell on the earth. A sage named Nag kept that semen from Lord Shiva's trouble with the wish that Lord Ramchandra's work would be accomplished through it. Lord Hanuman was born from the 11th of Anjani of Dadu province. The reason for his incarnation in this way was that till 4th March, Lord Ramchandra had performed a great penance of Lord Shiva in Vain. Then Lord Shiva, after testing him, incarnated along with his village. All the gods also, after taking Lord Shiva's permission, assumed the form of a monkey and a rich man. When Lord Ramchandra, considering Ravana to be very powerful, praised Lord Shiva a lot, then Lord Shiva, being pleased, incarnated from the pride of Anjani. He took out the Sun itself. Seeing this, the gods realized that he was the He is the incarnation of Lord Shiva. He sent the message of Ramchandra to his wife Sita in Lanka. He destroyed Ravana's Ashok Vatika Kujad and burnt Lanka to ashes. He built a bridge in the sea. When Lakshman was hit by Shakti's attack, seeing his condition, Ramchandra felt very sad. Hanuman brought medicine and revived Lakshman and relieved Ramchandra's sorrow. Then he adopted the way of devotion and made devotion famous in the world. That is why he became famous as Ramdoot. O Narad, Lord Shiva took the form of Hanuman to complete Ramchandra's work. He made Ram and Lakshman very happy by uprooting Ravana's arm. By worshipping him, the snake of Asan got salvation. The same is the condition of Lord Vishnu. He assumed the form of Krishna and became the charioteer of Arjun and a Pandava. After listening to this much of the story, Brahma said, Narad, Samakadik, our four sons are the ultimate supporters. They keep the image of Sadashiv in their hearts in all the three worlds and do Brahmin work. One day, they reached Vishnu Lok and seeing Vaikunth, they happily wished that they would see Lord Vishnu. Thinking so, they went inside but on the seventh road, Vishnu's songs named Jai Om Vijay stopped them and did not let them go inside in any way. Then Sankadik got angry and with the inspiration of Lord Shiva cursed those songs that you both will not stay here anymore, you have stopped us from going to Vishnu's temple, your act is like that of demons, therefore both of you will be saved. Meanwhile, Lord Vishnu also came out from inside and praised Sankadi a lot. Dadu pleased Lord Vishnu and let our people come. Both the Ganpati's sons born from the wine of Samkadik became famous as Kanak Shishu and Kanak Akshay. They were so powerful that they immediately conquered the three worlds. Then according to the wish of the gods, Lord Vishnu took the form of Dwar and killed Kanakaksha. Taking the form of Narsingh, Kanak Shishu was killed. Both those songs were cursed to be demons for three births. Therefore, they took the birth of Kumbhakaran and Ravana and did great devotion to Lord Shiva. After this, fascinated by your teachings, he uprooted Kailash from its roots. Seeing this, Shiv Ji cursed Ravana and said that a human being like him will be born and will remove his ego. O Narada, it was because of Shiv Ji's curse that both the demons got lost on their way and created many disturbances in the world. Then the Gods etc. became sad and went to Vishnu Ji and told him the whole story of Ravana. Then Vishnu Ji said that Ravana is a great devotee of Shiv Ji, no one can defeat him but what can we do with Shiv Ji, he will take the form of a human and after worshipping Shiv Ji and getting blessings from him, he will kill Ravana. Saying this, he bid farewell to the Gods and himself wished to take the form of a human. Thus he took the incarnation of Dashrath, the king of Ayodhya. Ramchandra Ji was married to Janak's daughter Sita. Then Ramchandra Ji, by the order of King Dashrath, left the kingdom and went to the forest for the work of the Gods. From there, Ravana abducted Sita, which pained Ramchandra Ji a lot. Ramchandra Ji took teachings from Agastya Muni and worshipped Shiv Ji. Shiv Ji was pleased and killed Ravana and gave his bow to Ramchandra Ji. Ramchandra Ji strung it and shot Ravana. killed Sita and regained her

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