ब्रह्मा जी बोले हे नारद मैं तुम्हें अवधूत पति अवतार की कथा सुनाता हूं एक दिन इंद्र ने सदाशिव जी के दर्शनों की इच्छा से सब देवताओं को एकत्र किया तथा यह विचार किया कि हम सब देशों के राजा महाराजा है आज तो हमको बहुत सी सामग्री सहित शिवजी से भेंट करनी चाहिए इस प्रकार निश्चय कर उन्होंने अनेक प्रकार की सामग्रीय खतरा कि उसे समय 11 रूद्र 12 सूर्य ऑटो वासु तेरा विश्वेश्वर देव समस्त मारुदगढ़ सब दिग्गज देवता तथा मुनीश्वर भली प्रकार सर्च कर बड़ी धूमधाम से खतरा होकर बृहस्पति को साथ लेकर शिवजी से मिलन के लिए चले सभी प्रेम में मांगना थे कोई गाता कोई बजना तथा कोई हंसता हुआ चल आ रहा था जब वह सब कैलाश पर्वत के निकट पहुंचे तो शिव जी ने इंद्र का ऐसा गर्भ देखकर लीला के निर्माता अपना भयंकर रूप धारण किया इंद्र ने इस अवधूत को देखकर प्रणाम किया और पूछा है परमहंस आप कौन हैं तथा आप कहां से आए हैं प्रतीत होता है कि आप इसी समय शिव जी के पास से आ रहे हैं कृपा करके आप हमें बताएं कि शिवजी इस समय कहां है तथा क्या कर रहे हैं वह कहीं चले तो नहीं गए अवधूतने इंद्र के प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया तब इंद्र ने पुनः उनसे पूछा की कृपा करके आप यह बतलाएं जिससे कि शिवाजी कहां है किस प्रकार इंद्र ने अवधूत से कोई बार शिव जी के विषय में पूछा परंतु अद्भुत थे इंद्र को कोई उत्तर ना दिया तब इंद्र ने क्रोधित होकर अपना बज उठाते हुए कहा अरे दुष्ट अवधूत तू हमको कोई उत्तर नहीं देता मैं तुमको अपनी बज से मार देता हूं देखूंगा तेरा कौन रक्षा करेगा यह कहकर इंद्र ने अवधूत पर बज चलाया वहां बज उसे कंठ में लगकर जिससे श्याम रंग का चिन्ह पड़ गया परंतु राज में इस समय जलकर भस्म हो गया यह देख देवताओं की सेवा में आकर मच गया दादू प्रांशु जी ने क्रोध की ज्वाला इतनी बड़ी की सब देवता उज्वला से जलने लगे इंदिरा ऐसे लीला देख कहां उठे उन्होंने तुरंत ही अपने गुरु का स्मरण किया यहां बृहस्पति ने शिवजी का ध्यान किया तथा शिवजी को पहचान तब उसकी स्तुति करके इंद्र से यह कहा है इंद्र यह अवधूत नहीं अभी तो स्वयं सदा शिवजी है इतना कह कर बृहस्पति ने शिवजी का अत्यंत आदर किया तथा कहा कि यह सब के स्वामी है तब इंद्र आदि सब देवताओं में देवताओं ने भी प्रेम के साथ शिवजी की स्तुति की शिवजी यही स्तुति सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले है इंद्र तथा अन्य देवताओं हम तुम्हारे यह स्तुति सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुए हैं आप तुम हमसे अपनी इच्छा अनुसार वर मांगो यह सुनकर बृहस्पति अत्यंत प्रसन्न हुए तथा उन्होंने शिवजी से यह वर मांगा की है शिवजी इंद्र आपका सेवक है आप इसकी रक्षा कीजिये है नारद बृहस्पति कैसे वचन सुनकर शिवजी ने कहा बृहस्पति हम कृपा करके ही ज्वाला को यहां से इतनी दूर फेंक दें कि इनका प्रभाव इंद्र पर कुछ ना होगा तुमने आज इंद्र को जीवन दान दिया है इससे तुम्हारा नाम जीवन होगा शिवजी ने यह कहा कर उसे क्रोध अग्नि को गंगा में फेंक दिया जिस पल-दर देते उत्पन्न हुआ है नारद को दूध शिवजी यह चरित्र कर वहां से अंतर ध्यान हो गए उसे सब देवताओं को बहुत आनंद प्राप्त हुआ फिर सब लोग प्रसन्न होकर अपने-अपने स्थान को लौट आए जो मनुष्य अवधूतेश्वर अवतार के चरित्र का पाठ करेगा या सुनेगा वह दोनों लोक में अत्यंत आनंद प्राप्त करेगा
TRANSLATE IN ENGLISH
Brahma Ji said O Narada, I will tell you the story of Avdhoot Pati Avatar. One day Indra gathered all the gods with the desire to have Sadashiv Ji's darshan and thought that we are the kings of all the countries, today we should meet Shiv Ji with a lot of material. Deciding thus, he collected many types of material. After searching him thoroughly, 11 Rudra 12 Surya Auto Vasu Tera Vishwaeshwar Dev, all the big gods and sages of Marudgarh, he went with Brihaspati to meet Shiv Ji with great pomp and show. All were asking for love, some were singing, some were playing and some were laughing. When they all reached near Kailash Parvat, Shiv Ji, seeing Indra in such a state, assumed his fierce form, the creator of the leela. Indra, seeing this Avdhoot, bowed down and asked, Paramhans, who are you and from where have you come? It seems that you are coming from Shiv Ji at this time. Kindly tell us where Shiv Ji is at this time and what is he doing? Has he gone somewhere? He did not give any answer to Indra's question. Then Indra again asked him to please tell him where Shivaji was. Indra asked Avdhoot about Shivaji many times but he was surprised that he did not give any answer to Indra. Then Indra got angry and raising his bugle said, "Hey evil Avdhoot, you are not giving me any answer. I will hit you with my bugle and I will see who will protect you." Saying this Indra fired the bugle at Avdhoot. The bugle hit his throat and left a black mark but the bugle burnt to ashes. Seeing this the gods came and got furious. Dadu Pranshu ji's anger was so big that all the gods started burning with brightness. Seeing such a play, Indira got up and immediately remembered her Guru. Here Brihaspati meditated on Shivaji and recognized Shivaji. Then after praising him he said to Indra that Indra, this is not Avdhoot. He is Shivaji himself. Saying this Brihaspati respected Shivaji a lot and said that he is the master of all. Then Indra and all the gods also prayed to Shivaji with love. He praised Indra and other gods. On hearing this praise, Lord Shiva became very happy and said, "We and other gods are very happy to hear your praise. You can ask for a boon from us as per your wish." On hearing this, Brihaspati became very happy and he asked this boon from Lord Shiva that, "Shivaji, Indra is your servant, please protect him." On hearing such words, Lord Shiva said, "Brihaspati, please throw the flames so far away from here that they will not have any effect on Indra. You have given life to Indra today, due to this your name will be Jeevan." Saying this, Lord Shiva threw the angry fire into the Ganga. The moment Narada was given milk, Lord Shiva went into meditation. After saying this, all the gods got very happy. Then everyone returned to their places happily. The person who will recite or listen to the story of Avdhooteshwar avatar will get immense happiness in both the worlds.
0 टिप्पणियाँ