श्री शिव महापुराण कथा सातवां खंड अध्याय 30 का भाग 2



हे नारद यह कहकर सुवचा प्रशांत पूर्वक सती हो गई तथा शिव लोक में पहुंचकर दधीचि सहित सदाशिव जी की सेवा में तत्पर रही शिवजी पीपल के वृक्ष के नीचे उत्पन्न हुए थे इसलिए मैंने उनका 20 प्लांट नाम रख दिया तब सब मिलकर बीसप्रोत की स्तुति करने लगे फिर हम सब प्लान किया गया प्रकार अपने अपने लोग को चले गए 20 प्लांट इस पीपल की जड़ में बैठकर तपस्या करते रहे एक दिन बीसपुलत मुनि पुष्प भद्रा नदी के तट पर जा रहे थे मार्ग में उन्होंने एक स्त्री को देख तब उन्होंने यह इच्छा की कि हम इसके साथ अपना विवाह कर गृहस्ट आश्रम ग्रहण करें इसी इच्छा से उसे स्त्री के माता-पिता के घर सांसारिक रीति से गए वहां लड़की राजा अरण्य की पुत्री थी अरण्य ने 20 प्लांट का बड़ा सम्मान किया जब विश्वास ने उनसे उसे कन्या को मांगा तब राजा औरन विषपुलत को दुर्बल देखकर चुप हो रहा उसने कोई उत्तर नहीं दिया यह देख विषपुलत ने राजा से कहा है राजन यदि तुम अपनी कन्या मुझे नहीं देते तो मैं तुम्हें भरम किया देता हूं जब राजा विश्वनाथ का ऐसा तेज देखा तब उसने रोते फिरते हुए अपनी लड़की का विवाह विश्व हाथ के साथ कर दिया विश्वास वहां से स्त्री को साथ ले अपने स्थान को लौट आए अरण्य की पुत्री ने पति व्रत धर्म का पूरी तरह पालन किया शिवजी के हंस में विश्वास तथा गिरजा के अंश में पदमा अर्थात राजा रनिया की पुत्री उत्पन्न हुई थी एक दिन 20 प्लांट की स्त्री ने अपने को भली भांति श्रृंगार रहित किया तथा विश्व प्लांट से आज्ञा लेने के पश्चात गंगा में स्नान के लिए चली धर्मराज ने मार्ग में राजा का स्वरूप धारण उसकी परीक्षा लेनी चाहिए वह पदमा से बोली है सुंदरी तुम्हारा पति तो वृद्ध कुरुख एवं अशोक वन तुम उसका त्याग हमारे पास आकर बिहार करो मुनि की स्त्री देखकर भला क्या आनंद पाओगी यह कहकर उन्होंने पद्मा का भाई पकड़ना चाहा परंतु इस समय पद्मा ने अत्यंत क्रोधित होकर यह कहा अरे दुष्ट तू दूर हो मुझे स्पर्श करने की दृढ़ता मत कर ना तूने मुझे को दृष्टि से देखा है इसलिए तेरा तेज नष्ट हो जाए हे नारद पदमा द्वारा यह शराब सुनकर धर्मराज का तेज इस समय मालिन हो गया तब वह राजा का शरीर त्याग असली रूप रखकर बिन करके बोल ही माता मां धर्मराज हूं मैं यह कविता आपकी परीक्षा लेने के लिए किया था अब आप मुझ पर कृपा करें क्योंकि आप जग माता है उसे समय पद्मा ने धर्मराज को पहचान कर कहा है धर्मराज सतयुग में तुम पूर्ण रूप से रहोगे तुमको किसी प्रकार का कष्ट ना होगा परंतु त्रेता में तुम्हारा एक पर द्वापर में दो पर तथा कलयुग में तीसरा भाव कट जाएगा क्योंकि मेरा वचन विद्यार्थी नहीं होता धर्मराज ने पदमा का यह श्राप सुन प्रसन्न होकर कहा है माता आपने मुझको नरगामी होने से बचा लिया अब मैं प्रसन्न होकर आपको व देता हूं कि आपके पति युवा होकर अत्यंत सुंदर हो जाए कोई अत्यंत कल कुशल विद्वान तथा बड़े अद्भुत चरित्र करने वाले होंगे आपके 10 पुत्र अत्यंत बुद्धिमान उत्पन्न होंगे धर्मराज या का कर वहां से अपने लोग को चले गए पदमा भी अपने स्थान को लौट आई इस प्रकार विषपुलाद अवतार ने अनेक मनुष्यों को संसार सागर से डूबते हुए बचाया था जब सांसारिक मनुष्य को शनिचर की दशा तथा दृष्टि में दुखी देख तो उन्होंने यहोवा दिया कि आज से शिव जी के भक्तों को तथा जन्म से 16 वर्ष तक के बालकों को शनिचर दुखी नहीं कर सकेगा शनिचरा का अशुभ फल विष्पलट के नाम से स्मरण मात्र से ही नष्ट हो जाएगा विश्वास तथा कौशिक मुनि के स्मरण में शनिचर कसा फल नहीं होता है नारद बिस्पलाद संसार भर का आनंद प्राप्त करने वाले तथा पदमा भी गिरजा का अवतार है उसकी स्मरण से सनातन वृद्धि होती है विषपुलत का यह आख्यान अत्यंत पवित्र है इसके पढ़ने वाले तथा सुनने वाले को दोनों लोक में सब कुछ मिलता है

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O Narada, saying this, Vishpulat became a sati peacefully and after reaching Shiv Lok, she remained ready to serve Sadashiv ji along with Dadhichi. Shiva was born under a Peepal tree, so I named him Vishpulat. Then all of us together started praising Vishpulat. Then we all went to our respective places as per the plan. Vishpulat kept doing penance sitting at the root of this Peepal tree. One day Vishpulat Muni was going to the bank of Bhadra river. On the way, he saw a woman. Then he desired that he should marry her and take up the household life. With this desire, he went to the woman's parents' house in a worldly way. There the girl was the daughter of King Aranya. Aranya respected Vishpulat a lot. When Vishwanath asked for his daughter from him, then King Auran remained silent on seeing Vishpulat weak. He did not give any answer. Seeing this, Vishpulat said to the king, "O King, if you do not give your daughter to me, then I will deceive you. When he saw such brilliance of King Vishwanath, then while crying, he asked for his daughter's marriage to Vishwanath. He trusted Padma and returned to his place taking the woman with him. The daughter of the forest followed the duty of her husband completely. She believed in Shiva's swan and in the part of the church. Padma, that is, daughter of King Rania was born. One day, the woman of 20 plants removed her makeup well and after taking permission from Vishwa Plant, went to take bath in Ganga. On the way, Dharmaraj should take the form of the king and test her. He said to Padma, "Beautiful lady, your husband is old and old. You leave him and come to us and live in the Kurukh and Ashoka forests. What pleasure will you get by seeing the wife of a sage." Saying this, he tried to catch Padma's brother, but at this time Padma became very angry and said, "Oh wicked one, go away, do not be adamant to touch me. You have seen me with your eyes, that is why your glory will be destroyed." Hearing this, Dharmaraj's glory became impure at that time. Then he left the king's body, taking the real form, said, "Maa Maa Dharmaraj, I am reciting this poem to test you. Now please be kind to me because you are the mother of the world." Time Padma recognized Dharmaraj and said Dharmaraj you will live fully in Satyug, you will not have any kind of pain, but in Treta your one birth will be cut, in Dwapar two births and in Kaliyug the third birth will be cut because my word is not valid Dharmaraj being happy on hearing this curse of Padma said mother you saved me from going to hell, now I am happy and give you that your husband will become young and very handsome, he will be a very skilled scholar and will have a wonderful character, you will have 10 sons who are very intelligent Dharmaraj said this and went from there with his people Padma also returned to her place, in this way Vishpulad avatar saved many people from drowning in the world ocean, when seeing the worldly people unhappy in the condition and sight of Shanichar, he said that from today onwards Shanichar will not be able to make the devotees of Shiva and children from birth to 16 years unhappy, the inauspicious result of Shanichar will be destroyed by just remembering the name of Vishplat. What kind of result does Shanichar have in Vishwas and Kaushik Muni Narad Bispalad said all over the world Those who attain bliss and Padma is also the incarnation of Girija, remembering her leads to eternal growth, this story of Vishpulat is very sacred, those who read and listen to it get everything in both the worlds.

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